मंजिल का नाराज होना भी जायज था… 
हम भी तो अजनबी राहों से दिल लगा बैठे थे…!

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हमको तो बस तलाश नए रास्तों की है, 
हम हैं मुसाफ़िर ऐसे जो मंज़िल से आए हैं...

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ये किस तरह की ज़िद दिल मुझ से करने लगा, 
जिसे मैंने भूलना चाहा उसे वो याद करने लगा .

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उसने मिलने की अजीब शर्त रखी… 
गालिब चल के आओ सूखे पत्तों पे लेकिन कोई आहट न हो!

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मुझे इस बात का गम नहीं कि बदल गया ज़माना;
मेरी जिंदगी तो सिर्फ तुम हो, 
कहीं तुम ना बदल जाना!

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